Ghazal-नीयत
***नीयत*** ये नीयत भी अजीब है, नहीं पता किसकी कब खराब हो जाए, मानो है अंगूर का गुच्छा, क्या पता कौन सा कब शराब हो जाए। कोई अगर जाना चाहता है टूट कर, तो विदा करो हंस कर, मामूली जर्रा है जो अभी, तपकर क्या पता कब आफताब हो जाए। जो रह गए हैैं साथ, उन पर आज ही उड़ेलिए दिल का पूरा प्यार, वक्त का क्या, जो है साथ आज पता नहीं वो कब ख्वाब हो जाए। अच्छा ना भी लगे फिर भी, सवाल पूछने वाले से डरना ठीक नहीं, जो पूछते रहते हैं, क्या पता हर सवाल का कब जवाब हो जाए। जिंदगी एक किताब है, लिखते रहो अच्छी बातें हर वक्त 'आनंद', क्या पता खुद वो आ जाए जेहन में और ग़ज़ल कब लाजवाब हो जाए। -मुकेश आनंद।